सोचिए, आप पेट्रोल पंप पर गए। गाड़ी में पेट्रोल भरवाया, पैसे दिए और घर लौट आए।
आपको लगा कि पेट्रोल की पूरी कीमत चुका दी।
लेकिन क्या वाकई ऐसा है?
उस पेट्रोल से निकलने वाला धुआँ हवा में मिला। प्रदूषण से बीमारियों का खतरा बढ़ा। कार्बन डाइऑक्साइड ने धरती का तापमान बढ़ाने में योगदान दिया।
इन नुकसानों का बिल किसके पास गया?
यही वह सवाल है जिसके जरिए दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक संस्थाओं में से एक, IMF, तेल, गैस और कोयले पर मिलने वाली सब्सिडी का हिसाब लगाती है।
IMF का 2024 का वैश्विक अनुमान
$7.4 ट्रिलियन
प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सब्सिडी का कुल अनुमान
स्रोत और संदर्भ
- IMF, दिसंबर 2025। आँकड़े अनुमानित हैं।
1. आखिर Fossil Fuel Subsidy होती क्या है?
Fossil Fuel यानी जमीन से निकलने वाले ऐसे ईंधन, जैसे कोयला, पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस।
जब सरकार किसी ईंधन को उसकी आपूर्ति लागत से कम कीमत पर उपलब्ध कराने में मदद करती है, तो उसे प्रत्यक्ष सब्सिडी कहा जा सकता है।
मसलन, अगर किसी ईंधन की आपूर्ति में ₹100 खर्च होते हैं और उपभोक्ता से ₹80 लिए जाते हैं, तो ₹20 का अंतर किसी न किसी तरीके से पूरा करना पड़ता है।
लेकिन IMF सब्सिडी को एक और व्यापक तरीके से देखती है। उसके मुताबिक ईंधन की कीमत में उससे होने वाले सामाजिक नुकसान की लागत भी शामिल होनी चाहिए।
IMF
सब्सिडी के दो अलग-अलग हिसाब
प्रत्यक्ष सब्सिडी (Explicit)
सरकार की आर्थिक मदद या आपूर्ति लागत से कम कीमत पर ईंधन उपलब्ध कराना।
अप्रत्यक्ष सब्सिडी (Implicit)
ईंधन की कीमत में प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और दूसरे सामाजिक नुकसान की पूरी लागत शामिल न होना।
2. दुनिया का रुझान क्या बता रहा है?
2022 में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ीं। कई सरकारों ने आम लोगों को महंगाई से राहत देने के लिए ईंधन की कीमतों पर सहायता बढ़ाई।
IMF के अनुमान के मुताबिक प्रत्यक्ष सब्सिडी 2022 में करीब 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई थी। 2024 में यह घटकर लगभग 725 अरब डॉलर रह गई। इसके विपरीत, अप्रत्यक्ष सब्सिडी का अनुमान 6.7 ट्रिलियन डॉलर था।
IMF
इससे एक अहम बात सामने आती है। सरकारों की सीधे दी जाने वाली मदद कम होने के बावजूद प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन से जुड़ी लागत का सवाल बना रहता है।
3. गरीबों को कितनी मदद मिलती है?
ईंधन सस्ता रखने का एक बड़ा मकसद आम लोगों को राहत देना होता है। लेकिन इसका फायदा सभी को बराबर नहीं मिलता।
IMF के 2025 के अध्ययन में जिन देशों के घरेलू आँकड़े उपलब्ध थे, उनके आधार पर सबसे गरीब 20 प्रतिशत परिवारों को प्रत्यक्ष ईंधन सब्सिडी के हर डॉलर में से सिर्फ 8 सेंट का लाभ मिला।
IMF
इसका मतलब यह नहीं कि गरीब परिवारों को सस्ते ईंधन की जरूरत नहीं है। बल्कि यह बताता है कि सभी को एक जैसी कीमत पर छूट देने से अधिक ईंधन इस्तेमाल करने वाले संपन्न परिवारों को रकम के हिसाब से ज्यादा फायदा मिल सकता है।
दूसरी ओर, सब्सिडी अचानक हटाने पर गरीब परिवारों के लिए रसोई गैस, बस का किराया और जरूरी सामान महंगा हो सकता है। इसलिए कीमतों में बदलाव के साथ सीधे आर्थिक सहायता और सार्वजनिक परिवहन जैसे उपायों पर भी चर्चा होती है।
4. भारत की कहानी
भारत में यह बहस सिर्फ पेट्रोल और डीज़ल की नहीं है। इसमें रसोई गैस, कोयला, बिजली और स्वच्छ ऊर्जा भी शामिल हैं।
IISD की दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2023–24 में भारत की Fossil Fuel Subsidies लगभग ₹94,248 करोड़ थीं, जो पिछले वित्त वर्ष से करीब 12 प्रतिशत कम थीं। रिपोर्ट ने इस गिरावट की एक प्रमुख वजह LPG सब्सिडी में कमी बताई।
IISD
लेकिन यहाँ दो अलग-अलग जरूरतें हैं।
एक तरफ लाखों परिवारों को सस्ती और स्वच्छ रसोई ऊर्जा की जरूरत है। दूसरी तरफ लंबे समय तक जीवाश्म ईंधन पर निर्भर रहने से प्रदूषण और आर्थिक जोखिम बढ़ सकते हैं।
इसलिए भारत के लिए सवाल सिर्फ सब्सिडी बढ़ाने या घटाने का नहीं, बल्कि यह भी है कि सहायता किसे मिल रही है, कितनी मिल रही है और उसका विकल्प क्या है।
5. क्या सब्सिडी हटाने से प्रदूषण खत्म हो जाएगा?
IMF का अनुमान है कि दुनिया भर में सिर्फ प्रत्यक्ष सब्सिडी हटाने से 2035 में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन अनुमानित सामान्य स्थिति के मुकाबले लगभग 6 प्रतिशत कम हो सकता है।
अगर ईंधन की कीमतों में पर्यावरण और अन्य सामाजिक नुकसान की पूरी लागत भी शामिल कर दी जाए, तो IMF के मॉडल में यह कमी 46 प्रतिशत तक पहुंचती है। यह एक अनुमानित परिदृश्य है, भविष्य में निश्चित रूप से होने वाला परिणाम नहीं।
IMF
इतने बड़े बदलाव के लिए ऊर्जा के सस्ते और भरोसेमंद विकल्प, बिजली की उपलब्धता और कम आय वाले परिवारों की सुरक्षा भी जरूरी होगी।
सपेरा की नज़र
पेट्रोल पंप पर दिखाई देने वाली कीमत और ईंधन की पूरी सामाजिक लागत हमेशा एक जैसी नहीं होती।
लेकिन इस कहानी के दो पहलू हैं। ईंधन महंगा होने से गरीब परिवारों और छोटे कारोबारियों पर तुरंत असर पड़ सकता है। वहीं प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन की लागत लंबे समय तक समाज को प्रभावित करती है।
इसीलिए असली बहस सिर्फ इतनी नहीं है कि सरकार सब्सिडी दे या न दे।
सवाल यह भी है कि सहायता का फायदा किसे मिलता है, उसकी कीमत कौन चुकाता है और लोगों के पास सस्ते, भरोसेमंद विकल्प कितने हैं।
पेट्रोल की रसीद पर तो सिर्फ ईंधन की कीमत लिखी होती है। उसके पूरे असर का हिसाब कहीं ज्यादा बड़ा है
खबर को सिर्फ पढ़िए नहीं, सवाल भी पूछिए।
किसी भी राजनीतिक खबर को समझने के लिए घटना के साथ उसका असर, संदर्भ और आगे होने वाले बदलावों पर भी नज़र रखना जरूरी है।
इस खबर को उपलब्ध रिपोर्टों और स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है।




