हरियाणा में बिजली सुधार की बहस अब दो अलग मोर्चों पर है। गुरुग्राम और नूंह में एक निजी कंपनी को समानांतर वितरण लाइसेंस देने पर कर्मचारियों और सरकारी निगमों ने आपत्ति की है। इसी बीच केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने राज्य की चार सरकारी बिजली कंपनियों की शेयर बाजार में लिस्टिंग की प्रक्रिया तेज करने को कहा है। दोनों घटनाक्रम जुड़े क्षेत्र से हैं, लेकिन उनका कानूनी और व्यावसायिक अर्थ एक नहीं है। उपभोक्ताओं के लिए असली प्रश्न हैं—सेवा की गुणवत्ता, बिजली की लागत और सब्सिडी का भविष्य। कर्मचारियों की चिंता नौकरियों और सरकारी नियंत्रण को लेकर है। इन सवालों को समझने के लिए लाइसेंस, लिस्टिंग और स्वामित्व-हस्तांतरण के बीच अंतर साफ रखना जरूरी है।
समानांतर लाइसेंस और राजस्व का संकट
विवाद की शुरुआत तब हुई जब हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग ने गुरुग्राम और नूंह के लिए 'इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड' को 25 साल का समानांतर बिजली वितरण लाइसेंस दे दिया। यह कंपनी जून 2025 में स्थापित हुई थी और इसकी अधिकांश हिस्सेदारी एक निजी निवेश समूह के पास है। इस फैसले के बाद राज्य के बिजली निगमों के सामने यह चिंता खड़ी हो गई कि निजी कंपनी के आने से बड़े और अधिक भुगतान करने वाले उपभोक्ता उससे जुड़ जाएंगे, जिससे सरकारी कंपनियों को हर साल भारी राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा।
कर्मचारियों की हड़ताल और सरकार का दखल
निजी लाइसेंस मिलने के तुरंत बाद, हरियाणा के बिजली कर्मचारियों और विभिन्न यूनियनों ने इसे निजीकरण का सीधा दरवाजा करार दिया। इसके विरोध में राज्यभर में लगभग 40,000 से 55,000 बिजली कर्मचारी तीन दिन की हड़ताल पर चले गए। हड़ताल के दौरान गुरुग्राम, रेवाड़ी, सोनीपत और अंबाला जैसे इलाकों में बिजली गुल होने से व्यापक ब्लैकआउट की स्थिति पैदा हो गई और पानी की सप्लाई भी बाधित हो गई। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और मुख्यमंत्री के साथ बातचीत के बाद कर्मचारियों ने हड़ताल वापस ली। इसके बाद हरियाणा सरकार ने नीतिगत दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए आयोग को इस लाइसेंस के मामले में आगे की कार्रवाई रोकने के निर्देश दे दिए।
केंद्र की लिस्टिंग नीति पर नया विवाद
इस स्थानीय विरोध के बीच ही केंद्र सरकार का एक नया निर्देश सामने आया है, जिसने इस पूरे मामले में एक नया मोड़ ला दिया है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय ने हरियाणा के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर राज्य की चार सरकारी बिजली कंपनियों की शेयर बाजार में लिस्टिंग की प्रक्रिया को तेज करने को कहा है। इन कंपनियों में बिजली उत्पादन, पारेषण और वितरण से जुड़ी इकाइयां शामिल हैं। केंद्र सरकार का तर्क है कि इस कदम से कंपनियों में वित्तीय अनुशासन, बेहतर कामकाज और आधुनिकीकरण को बढ़ावा मिलेगा।
हालांकि, कर्मचारी संघों और यूनियनों ने केंद्र के इस कदम को भी निजीकरण का ही एक परोक्ष रूप माना है। उनका कहना है कि स्टॉक लिस्टिंग से धीरे-धीरे सरकारी हिस्सेदारी कम हो जाएगी और अंततः नियंत्रण निजी हाथों में चला जाएगा। यूनियनों का यह भी तर्क है कि इससे क्रॉस-सब्सिडी का वह ढांचा बिगड़ जाएगा जिसके जरिए आम जनता और कृषि क्षेत्र को सस्ती बिजली मिलती है। वहीं दूसरी ओर, राज्य सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों का कहना है कि वे इस पूरे मामले पर कानूनी विकल्पों और नियमों के दायरे में रहकर विचार कर रहे हैं।
निजी कंपनी का पक्ष भी इस बहस का हिस्सा है। Eleven Power ने सरकारी निगम की राजस्व-हानि संबंधी आशंकाओं से असहमति जताई है। उसका कहना है कि उसकी योजना में मौजूदा उपभोक्ताओं के साथ नए कनेक्शन भी महत्वपूर्ण हैं और ग्रामीण क्षेत्रों को भी आवेदन में शामिल किया गया है। इसलिए सेवा और लागत पर वास्तविक असर को कंपनी के दावों या कर्मचारियों की आशंकाओं से आगे, लागू शर्तों और क्रियान्वयन के आधार पर परखना होगा। आगे नजर नियामक और कानूनी कार्यवाही, लिस्टिंग के औपचारिक प्रस्ताव तथा सरकार की हिस्सेदारी और नियंत्रण से जुड़ी शर्तों पर रहेगी। केवल लिस्टिंग का निर्देश आना, लाइसेंस का अंतिम निपटारा होना और किसी कंपनी का नियंत्रण निजी हाथों में जाना—तीन अलग घटनाएँ हैं। अभी इनमें से किसी को दूसरे का तय परिणाम मानना उचित नहीं है।
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