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कुर्सी का खेल• ARTICLE #803• 30 अक्टूबर 2026 को 10:17 pm बजे

भारत में शिपिंग कंटेनर बनाने की राह आसान, सरकार ने मंजूर की 10,000 करोड़ रुपये की योजना

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने देश में ही शिपिंग कंटेनर बनाने को बढ़ावा देने के लिए 10,000 करोड़ रुपये की योजना को मंजूरी दे दी है। इस कदम से चीन पर निर्भरता कम होने और रोजगार के नए अवसर मिलने की उम्मीद है।

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भारत में शिपिंग कंटेनर बनाने की राह आसान, सरकार ने मंजूर की 10,000 करोड़ रुपये की योजना
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भारत को वैश्विक लॉजिस्टिक्स और शिपिंग के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए केंद्र सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये की कंटेनर मैन्युफैक्चरिंग प्रमोशन स्कीम को हरी झंडी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में इस योजना को औपचारिक मंजूरी मिली। इस योजना का मुख्य उद्देश्य देश के भीतर ही माल ढुलाई वाले शिपिंग कंटेनरों का बड़े पैमाने पर उत्पादन करना है, ताकि वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी बाधाओं और आयात पर अत्यधिक निर्भरता को कम किया जा सके।

वर्तमान में वैश्विक शिपिंग कंटेनर बाजार पर चीन का एकछत्र राज है। आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया के 90 से 95 प्रतिशत कंटेनरों का निर्माण अकेले चीन में होता है। कोविड-19 महामारी के दौरान जब वैश्विक स्तर पर कंटेनरों की भारी किल्लत हुई और माल भाड़े में बेतहाशा बढ़ोतरी देखी गई, तब भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं के लिए इस आयात पर निर्भरता का जोखिम खुलकर सामने आया था। भारत अपनी जरूरत के लिए हर साल लगभग 20 लाख खाली कंटेनर आयात करता है, जबकि घरेलू स्तर पर उत्पादन क्षमता बेहद सीमित है।

इस नई योजना को वित्त वर्ष 2039-40 तक यानी कुल 13 वर्षों की लंबी अवधि के लिए लागू किया गया है। सरकार का लक्ष्य इसके जरिए देश की वार्षिक कंटेनर निर्माण क्षमता को लगभग दस गुना बढ़ाकर 7.5 लाख टीयूई यानी ट्वेंटी-फुट इक्विवेलेंट यूनिट्स तक ले जाना है। इस योजना के तहत घरेलू विनिर्माताओं को वित्तीय मदद दी जाएगी ताकि वे वैश्विक बाजारों में टिक सकें।

योजना को सुचारू रूप से चलाने और इसे प्रभावी बनाने के लिए तीन प्रमुख घटकों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। इसमें पूंजीगत ऋणों के लिए 859 करोड़ रुपये की ब्याज सहायता, उत्पादन और बिक्री को बढ़ावा देने के लिए 8,891 करोड़ रुपये की परिचालन व्यय सहायता और कंटेनरों के गुणवत्ता परीक्षण तथा प्रमाणन के लिए 150 करोड़ रुपये का प्रावधान शामिल है। इन उपायों के जरिए सरकार का प्रयास चीनी कंटेनरों की तुलना में भारतीय कंटेनरों की अधिक लागत से जुड़ी चुनौती को पाटना है, क्योंकि वर्तमान में घरेलू स्तर पर बने कंटेनर चीन के मुकाबले 30 से 40 प्रतिशत तक महंगे पड़ते हैं।

इस बड़े वित्तीय पैकेज से देश में आर्थिक गतिविधियों को रफ्तार मिलने के साथ-साथ रोजगार के मोर्चे पर भी बड़े फायदे की उम्मीद जताई गई है। सरकारी अनुमानों के अनुसार, इस योजना के पूरी तरह लागू होने से लगभग 3,000 प्रत्यक्ष और 50,000 से अधिक अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इसके अलावा, विशेष स्टील, लकड़ी के फ्रेम और पेंट जैसे सहायक उद्योगों को भी इससे सीधा प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।

सरकार के इस कदम को लेकर उद्योग जगत में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। हाल ही में वैश्विक शिपिंग प्रमुख ए.पी. मोलर-मर्स्क के लिए भारत में पहला घरेलू निर्मित आयात-निर्यात शिपिंग कंटेनर तैयार किए जाने का उदाहरण भी सामने आ चुका है। अधिकारियों का मानना है कि दुनिया भर की बड़ी शिपिंग कंपनियां चीन के अलावा विनिर्माण के दूसरे विकल्प तलाश रही हैं, और यह समय भारत के लिए एक मजबूत मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में उभरने का सबसे सही मौका है।

हालांकि, इस पूरी योजना की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि क्या वैश्विक शिपिंग लाइन्स बड़े पैमाने पर भारतीय निर्मित कंटेनरों को स्वीकार करती हैं और क्या घरेलू निर्माता तय समयसीमा के भीतर अपनी उत्पादन क्षमता को अपेक्षित स्तर तक बढ़ा पाते हैं। आने वाले वर्षों में इन चुनौतियों से निपटना ही इस बात तय करेगा कि भारत वैश्विक कंटेनर बाजार में कितनी बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर पाता है।

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