भारत और न्यूजीलैंड के बीच लंबे समय से चली आ रही चर्चाओं के बाद आखिरकार मुक्त व्यापार समझौता लागू हो गया है। यह समझौता भारत के लिए कई मायनों में अहम है, क्योंकि इसके तहत भारतीय निर्यातकों को न्यूजीलैंड के बाजार में सभी उत्पादों पर पूरी तरह से शुल्क-मुक्त पहुंच हासिल हुई है। दोनों देशों के बीच इस व्यापार समझौते का उद्देश्य आने वाले वर्षों में आर्थिक साझेदारी को एक नए स्तर पर ले जाना है। इस समझौते पर पहले ही हस्ताक्षर किए जा चुके थे और कानूनी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद इसे आधिकारिक तौर पर अमल में लाया गया है।
इस समझौते के लागू होने के साथ ही दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार को आने वाले समय में दोगुना करने का बड़ा लक्ष्य रखा है। इसके अलावा, निवेश के मोर्चे पर भी एक बड़ी प्रतिबद्धता सामने आई है, जिसके तहत न्यूजीलैंड की ओर से भारत में अगले डेढ़ दशक में बड़े पैमाने पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किए जाने की योजना है। इस आर्थिक साझेदारी का मकसद दोनों देशों के बीच व्यापारिक खाप को पाटना और छोटे व्यवसायों तथा बड़े निर्यातकों दोनों के लिए रास्ते आसान करना है।
कारोबार और निर्यात के मोर्चे पर क्या बदला है
भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए इस समझौते की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह देश का ऐसा पहला मुक्त व्यापार समझौता है जिसमें प्रवेश के पहले दिन से ही सभी टैरिफ लाइनों पर सौ प्रतिशत शुल्क-मुक्त पहुंच सुनिश्चित की गई है। कपड़ा, परिधान, चमड़ा, इंजीनियरिंग सामान, वाहन और कलपुर्जे, रसायन तथा दवाओं जैसे क्षेत्रों को इस व्यवस्था का सीधा फायदा मिलने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि इससे देश के छोटे और मध्यम उद्योगों तथा कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ मजबूत करने का बेहतरीन अवसर मिलेगा।
हालांकि, शुल्क हटने के बाद भी भारतीय कारोबारियों के सामने कुछ व्यावहारिक चुनौतियां बनी रहेंगी। विशेषज्ञों का मानना है कि न्यूजीलैंड के कड़े खाद्य सुरक्षा मानक, उत्पाद प्रमाणन नियम और ऊंची शिपिंग लागत जैसी बाधाओं को पार करना भारतीय निर्यातकों के लिए एक बड़ी परीक्षा होगी। इन तकनीकी और कानूनी पैमानों पर खरा उतरे बिना वहां के बाजार में टिक पाना आसान नहीं होगा, जिसके लिए स्थानीय व्यवसायों को अपनी तैयारी पुख्ता करनी होगी।
संवेदनशील क्षेत्रों और कृषि को क्या सुरक्षा मिली है
व्यापारिक हितों के साथ-साथ घरेलू स्तर पर संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा का भी पूरा ध्यान रखा गया है। भारत ने अपने डेयरी किसानों, चीनी उत्पादकों, खाद्य तेल और प्याज जैसे संवेदनशील कृषि उत्पादों को इस मुक्त व्यापार समझौते की रियायतों से पूरी तरह बाहर रखा है। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि घरेलू किसानों और उत्पादकों के हितों पर किसी तरह का विपरीत असर न पड़े, ताकि स्थानीय बाजार की अर्थव्यवस्था सुरक्षित बनी रहे।
कृषि के क्षेत्र में आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए एक विशेष साझेदारी भी तय की गई है। इसके तहत सेब, कीवी और शहद के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जिनके पहले चरण के लिए उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, नागालैंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में स्थान तय किए गए हैं। इससे कृषि और बागवानी के क्षेत्र में तकनीक और उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलने की बात कही गई है।
छात्रों और पेशेवरों के लिए नए अवसर
इस समझौते का एक बड़ा और अहम हिस्सा शिक्षा और रोजगार से भी जुड़ा हुआ है। न्यूजीलैंड ने भारतीय छात्रों और युवाओं के लिए वीजा नियमों को आसान बनाया है, जिसके तहत STEM स्नातकों को तीन से चार साल तक के पोस्ट-स्टडी वर्क राइट्स दिए जा रहे हैं। इसके साथ ही, भारतीय युवाओं के लिए प्रति वर्ष एक तय संख्या में अस्थायी रोजगार प्रवेश वीजा और वर्किंग हॉलिडे वीजा का प्रावधान भी किया गया है।
सेवा क्षेत्र के मोर्चे पर भी भारतीय पेशेवरों के लिए नए दरवाजे खुले हैं। इस समझौते के तहत न्यूजीलैंड ने लगभग 118 सेवा क्षेत्रों और 139 उप-क्षेत्रों में बाजार पहुंच प्रदान की है, जिसमें भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों जैसे आयुर्वेद और योग के लिए भी पहली बार विशेष स्थान बनाया गया है। इससे स्वास्थ्य और सेवा क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए विदेशों में काम करने के नए अवसर पैदा होंगे।
यह समझौता भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत पिछले कुछ वर्षों में कई देशों के साथ व्यापार संधियों को अंतिम रूप दिया गया है। वैश्विक अनिश्चितताओं के दौर में भारत अपने निर्यात को विविधता देने और नए बाजार तलाशने पर जोर दे रहा है। न्यूजीलैंड के साथ हुआ यह समझौता इसी दिशा में एक और बड़ा कदम माना जा रहा है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारतीय निर्यातक वहां के कड़े मानकों और नियमों के बीच कितनी तेजी से अपनी जगह बना पाते हैं। इसके साथ ही, तय किए गए निवेश लक्ष्यों और व्यापारिक आंकड़ों को हासिल करने की दिशा में दोनों देश किस तरह आगे बढ़ते हैं, इस पर सबकी नजरें रहेंगी। यह समझौता कागजी वार्ताओं से आगे बढ़कर जमीन पर कितना असर दिखाता है, इसका असली इम्तिहान आने वाला वक्त ही तय करेगा।'
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