लद्दाख में पर्यावरण और शिक्षा संस्थान चलाने वाले जाने-माने कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन के बीच भूमि पट्टे को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। मामला लेह के फ्यांग थांग में स्थित उस भूमि से जुड़ा है, जो हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स, लद्दाख (HIAL) को आवंटित की गई थी। इस विवाद के केंद्र में यह सवाल है कि क्या समय पर पट्टा विलेख पूरा न होने के लिए प्रशासनिक लापरवाही जिम्मेदार थी या संस्थान नियमों का पालन करने में विफल रहा।
इस मामले में लद्दाख प्रशासन ने उच्च न्यायालय में एक विस्तृत हलफनामा दायर किया है, जिसमें पट्टा आवंटन रद्द करने के अपने फैसले का बचाव किया गया है। प्रशासन का पक्ष है कि यह आवंटन कानूनी रूप से निर्धारित अवधि के भीतर पूरा नहीं हुआ था, जिसके चलते इसे रद्द करने की कार्रवाई की गई। दूसरी ओर, सोनम वांगचुक और उनके संस्थान से जुड़े लोगों ने इस कार्रवाई को अनुचित बताते हुए प्रशासनिक तंत्र पर सवाल खड़े किए हैं और कहा है कि वे लंबे समय से अधिकारियों के चक्कर काट रहे थे।
विवाद की जड़ में मई 2018 का वह आवंटन है, जिसके तहत फ्यांग थांग में 1,076 कनाल और एक मरला भूमि एचआईएल को 40 साल के पट्टे पर दी गई थी। इस संस्थान का उद्देश्य पर्वतीय क्षेत्रों के विकास के लिए एक वैकल्पिक और आधुनिक विश्वविद्यालय स्थापित करना है। हालांकि, शुरुआत से ही इस भूमि के कागजी और प्रशासनिक कार्यों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया लंबी खींचती चली गई।
प्रशासन की ओर से उच्च न्यायालय में दायर हलफनामे में यह तर्क दिया गया है कि भूमि का यह आवंटन 5 मई 2019 को कानून के तहत स्वतः समाप्त हो गया था। प्रशासन के मुताबिक, एक साल की निर्धारित अवधि के भीतर न तो पट्टा विलेख निष्पादित हुआ और न ही अनिवार्य प्रीमियम राशि जमा की गई। लेह के डिप्टी कमिश्नर और LAHDC के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोमिल् सिंह डोनक की तरफ से यह हलफनामा एचआईएल द्वारा 21 अगस्त 2025 के आवंटन रद्द करने के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका के जवाब में दायर किया गया है।
इसके विपरीत, सोनम वांगचुक ने प्रशासनिक देरी और नौकरशाही की अड़चनों को मुख्य कारण बताया है। उन्होंने एक आधिकारिक पत्र का हवाला दिया है जो 19 फरवरी 2021 को जारी किया गया था। इस पत्र में इस बात का जिक्र था कि नई पट्टा नीति के लंबित होने और कोविड-19 महामारी के कारण पट्टा विलेख की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई थी, और संस्थानों को तब तक निर्माण कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई थी। वांगचुक का कहना है कि उन्होंने समय पर कागजी कार्रवाई और पट्टे के निष्पादन के लिए कई बार अधिकारियों से संपर्क किया था।
सोनम वांगचुक का दावा है कि उन्होंने अपने संस्थान के लिए समय पर पट्टा पूरा कराने के वास्ते पांच लिखित अपीलें की थीं, अधिकारियों के कार्यालयों के 15 चक्कर काटे थे और लगभग 30 फोन कॉल किए थे। उनका आरोप है कि सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने के बावजूद पट्टे की प्रक्रिया को आगे नहीं बढ़ाया गया, और अब उसी प्रशासनिक देरी को आधार बनाकर संस्थान पर कार्रवाई की जा रही है।
एचआईएल की सह-संस्थापक गीतांजलि आंगमो ने भी प्रशासन के इन दावों का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने प्रशासन के हलफनामे में लगाए गए आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि संस्थान के खिलाफ दिए गए तर्क सही नहीं हैं और उनके पास इस बात के दस्तावेज मौजूद हैं कि उन्होंने प्रक्रिया का पालन करने के लिए लगातार प्रयास किए थे।
यह पूरा विवाद केवल एक भूमि के पट्टे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लद्दाख में स्थानीय संस्थानों, भूमि अधिकारों और प्रशासन के बीच चल रहे व्यापक संवादहीनता के माहौल को भी उजागर करता है। इस संघर्ष के पीछे पिछले कुछ वर्षों के दौरान क्षेत्र में हुए राजनीतिक और सामाजिक घटनाक्रमों की पृष्ठभूमि भी जुड़ी हुई है, जिसके चलते इस तरह के प्रशासनिक और कानूनी मामले और अधिक संवेदनशील हो गए हैं।
न्यायालय की कार्यवाही के दौरान अदालत ने फिलहाल विवादित भूमि पर किसी भी तीसरे पक्ष के हित के सृजन पर रोक लगा दी है। इसका मतलब यह है कि अगली सुनवाई या अदालत के अगले आदेश तक इस जमीन पर किसी भी तरह का नया निर्माण या व्यावसायिक हस्तांतरण नहीं किया जा सकता है।
इस कानूनी लड़ाई में अब मुख्य निर्णय उच्च न्यायालय के हाथ में है। अदालत यह तय करेगी कि प्रशासन द्वारा पट्टे को स्वतः समाप्त माना जाना कानूनी रूप से कितना सही था और क्या एचआईएल द्वारा दिए गए प्रशासनिक देरी के तर्क को स्वीकार किया जाएगा या नहीं।
इस मामले का आगामी रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत दोनों पक्षों के दस्तावेजों और दलीलों का किस प्रकार मूल्यांकन करती है। एक तरफ जहां प्रशासन अपने वैधानिक नियमों और समयसीमा के पालन पर जोर दे रहा है, वहीं संस्थान का पक्ष प्रशासनिक तंत्र की अड़चनों और पत्राचार के रिकॉर्ड पर टिका है।
लद्दाख जैसे संवेदनशील और दुर्गम क्षेत्र में विकास कार्यों और वैकल्पिक संस्थानों के संचालन के लिए नियमों का पालन और प्रशासनिक पारदर्शिता दोनों ही बेहद जरूरी माने जाते हैं। इस मामले का फैसला आने वाले समय में क्षेत्र में भूमि आवंटन और संस्थागत कामकाज से जुड़े कई अन्य मामलों के लिए भी एक बड़ा उदाहरण बन सकता है।
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