इस चुनाव में राजस्थान की 147 शहरी स्थानीय निकायों के लिए मतदान हुआ। इनमें 6 नगर निगम, 20 नगर परिषद और 121 नगर पालिकाएं शामिल हैं। कुल 4,852 वार्डों में 18,266 उम्मीदवार मैदान में थे।

आंकड़ा बड़ा है, लेकिन राजनीति इससे भी बड़ी है।

क्योंकि नगर निगम और नगर पालिका का चुनाव सिर्फ सड़क, नाली और सफाई का चुनाव नहीं होता।

यहीं से स्थानीय नेताओं की राजनीतिक जमीन तैयार होती है।

BJP और कांग्रेस के लिए क्यों अहम?

राजस्थान में सत्ता BJP के पास है, जबकि कांग्रेस राज्य की प्रमुख विपक्षी ताकत है।

शहरी निकायों के नतीजे दोनों दलों के संगठन की जमीन पर मौजूदगी का भी संकेत देंगे।

किस पार्टी के कार्यकर्ता बूथ तक वोटर पहुंचा पाए?

किसके उम्मीदवार स्थानीय मुद्दों पर भरोसा पैदा कर पाए?

और सबसे बड़ा सवाल—

शहरों का वोट किसके साथ गया?

यही नतीजे आने वाले समय में विधानसभा की राजनीति के लिए भी संकेत दे सकते हैं, हालांकि स्थानीय चुनाव के परिणामों को सीधे विधानसभा चुनाव का परिणाम मानना सही नहीं होगा।

मतदान के साथ विवाद भी

ऊंचे मतदान के बीच कुछ जगहों पर विवाद भी सामने आए।

जयपुर, बाड़मेर, बीकानेर और झुंझुनूं सहित कुछ क्षेत्रों में EVM से जुड़ी शिकायतें और फर्जी मतदान के आरोप लगाए गए। कांग्रेस ने दो मौतों की जांच की मांग भी उठाई।

इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

यही वजह है कि अब चुनावी नतीजों के साथ-साथ प्रशासन और चुनाव प्रक्रिया पर भी नजर रहेगी।

असली खेल अब शुरू होगा

मतदान खत्म होते ही नेताओं की असली बेचैनी शुरू होती है।

क्योंकि चुनाव जीतने के लिए सिर्फ वोट पाना काफी नहीं होता।

नगर निकायों में बोर्ड बनाने के लिए बहुमत, पार्षदों का समर्थन और कई बार निर्दलीय उम्मीदवारों की भूमिका भी निर्णायक बन जाती है।

यहीं से शुरू होती है स्थानीय सत्ता की असली राजनीति।

एक तरफ पार्टी का टिकट लेकर चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार हैं।

दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार हैं, जिनके पास जीतने के बाद सत्ता की चाबी हो सकती है।

अगर किसी निकाय में किसी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलता, तो चुनाव खत्म होने के बाद भी कुर्सी का खेल जारी रह सकता है।

सपेरा की नज़र

RAJNITIK SAPERA की नजर में इस चुनाव की सबसे दिलचस्प बात सिर्फ 72.95% मतदान नहीं है।

असली सवाल है—

इतने बड़े मतदान के बाद शहरों की कुर्सी किसके हाथ आती है?

क्योंकि स्थानीय राजनीति में जीतने वाला सिर्फ एक पार्षद नहीं बनता।

वह अपने क्षेत्र में पार्टी का चेहरा बनता है।

और अगर यही चेहरे अगले विधानसभा चुनाव में जमीन पर उतरते हैं, तो आज का नगर निकाय चुनाव कल की बड़ी राजनीति की नींव बन सकता है।

इसलिए राजस्थान के इन चुनावों को सिर्फ नगर पालिका का चुनाव समझना शायद जल्दबाजी होगी।

वोटिंग खत्म हो चुकी है। अब असली खेल नतीजों के बाद होगा।

और राजनीति में अक्सर—

कुर्सी तक पहुंचने का रास्ता वोटिंग मशीन से निकलकर पार्षदों की गिनती तक जाता है।

यही है—

कुर्सी का खेल।

Source: Indian Express Published: 12 सितंबर 2026