LIVEसत्ता से सवाल, जनता की आवाज़
राजनीतिक सपेरा
राजनीतिक सपेरा
सत्ता के खेल पर नज़र
सपेरा फाइल• ARTICLE #737• 26 अक्टूबर 2026 को 10:05 pm बजे

महाराष्ट्र में साढ़े चार साल में 13 हजार से ज्यादा किसानों की आत्महत्या, हर दिन औसतन आठ से अधिक मौतें

आरटीआई से मिले आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच कुल 13,928 किसानों ने आत्महत्या की। इस दौरान सरकारी मदद और प्रशासनिक दावों को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है।

राजनीतिक सपेरा•4 मिनट पढ़ने का समय
शेयर करें
महाराष्ट्र में साढ़े चार साल में 13 हजार से ज्यादा किसानों की आत्महत्या, हर दिन औसतन आठ से अधिक मौतें
राजनीतिक सपेरा

महाराष्ट्र में कृषि संकट और किसानों की आत्महत्या के आंकड़े एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं। सामने आए ताजा आरटीआई आंकड़ों के अनुसार, राज्य में जनवरी 2022 से जून 2026 के बीच कुल 13,928 किसानों ने अपनी जान गंवाई है। इसका सीधा मतलब यह है कि इन 54 महीनों के दौरान राज्य में हर दिन औसतन आठ से अधिक किसानों ने आत्महत्या की। यह दर्दनाक सिलसिला यह बताने के लिए काफी है कि खेती किसानी से जुड़े परिवारों पर किस हद तक आर्थिक और मानसिक दबाव बना हुआ है।

राहत एवं पुनर्वास विभाग के इन आंकड़ों के मुताबिक, प्रशासन ने आत्महत्या के कुल मामलों में से 8,945 मामलों को आर्थिक सहायता के लिए पात्र माना है। हालांकि, इसके साथ ही बड़ी संख्या में मामलों को खारिज भी किया गया है। विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, 4,042 मामलों को अपात्र बताकर सहायता सूची से बाहर कर दिया गया, जबकि 941 मामलों की जांच अभी भी लंबित है। इन तमाम प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच प्रभावित परिवारों की मुश्किलें कम होती नहीं दिखतीं।

पात्र पाए गए मामलों में से अब तक 8,650 परिवारों को एक-एक लाख रुपये की वित्तीय सहायता मिल चुकी है। इसके बावजूद, सहायता राशि के वितरण की रफ्तार पूरी तरह संतोषजनक नहीं कही जा सकती, क्योंकि अभी भी 295 परिवार सरकारी मदद का इंतजार कर रहे हैं। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि आपदा और संकट के इस दौर में पीड़ित परिवारों तक मदद तेजी से पहुंचाई जाए, लेकिन कागजी कार्रवाई और नियमों की पेचीदगियों के कारण कई परिवार महीनों चक्कर काटने को मजबूर होते हैं।

इस पूरे मामले में प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर भी तीखे सवाल खड़े हो रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता जितेंद्र घाडगे ने आरोप लगाया है कि इस बार राज्य सरकार ने जिलावार और महीनेवार आंकड़े देने से साफ इनकार कर दिया और केवल राज्य-स्तरीय समेकित आंकड़े ही उपलब्ध कराए। उनका कहना है कि जिलावार डेटा न मिलने से यह साफ तौर पर समझना मुश्किल हो जाता है कि राज्य के किस हिस्से में कृषि संकट सबसे ज्यादा गहराया हुआ है और किन इलाकों में सरकारी नीतियों को सबसे ज्यादा सुधार की जरूरत है।

दूसरी तरफ, प्रशासनिक हलकों और लोक सूचना अधिकारियों का कहना रहा है कि इस तरह की विस्तृत जानकारी स्थानीय जिला कलेक्टर कार्यालयों के स्तर पर उपलब्ध होती है। इस विरोधाभास के बीच यह बहस तेज हो गई है कि क्या सरकार संवेदनशील मामलों में जमीनी हकीकत को पूरी पारदर्शिता के साथ सामने लाने से बच रही है। पूर्व में भी विधानसभा के पटल पर और अन्य मंचों पर इन आंकड़ों को लेकर चर्चा होती रही है, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात में कोई बड़ा सुधार देखने को नहीं मिला है।

महाराष्ट्र में कर्ज का बढ़ता बोझ, फसल खराब होने की लगातार घटनाएं और मौसम की अनिश्चितता किसानों के लिए जानलेवा साबित हो रही है। बारिश समय पर न होना या फिर जरूरत से ज्यादा बरसकर फसल को बर्बाद कर देना, इन सबकी मार सीधा किसान की आजीविका पर पड़ती है। जब फसल हाथ से निकल जाती है और कर्ज चुकाने का दबाव बढ़ता है, तो कई किसान इस भयानक कदम को उठाने पर मजबूर हो जाते हैं। सरकारी मुआवजा और पैकेज अपनी जगह हैं, लेकिन वे इन परिवारों के स्थाई समाधान के रूप में नाकाफी साबित हो रहे हैं।

इस पूरी स्थिति के बीच यह सवाल सबसे बड़ा है कि क्या प्रशासनिक नीतियां और राहत पैकेज उन लोगों तक पूरी तरह पहुंच पा रहे हैं जिन्हें इनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। अपात्र घोषित किए गए 4,042 मामलों के पीछे क्या ठोस कारण रहे, यह भी अपने आप में एक बड़ा सवाल है। कागजी नियमों और पात्रता की शर्तों में उलझकर कई जरूरतमंद परिवार मदद से वंचित रह जाते हैं।

विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि केवल वित्तीय सहायता के आंकड़े जारी कर देने भर से समस्या हल नहीं होगी। जब तक कृषि क्षेत्र की मूल समस्याओं, जैसे कि सिंचाई के साधन, सही दाम और कर्ज के जाल से मुक्ति पर ठोस काम नहीं होगा, तब तक इस तरह के आंकड़े बढ़ते रहेंगे। फिलहाल आरटीआई से सामने आए इन डरावने आंकड़ों ने एक बार फिर सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजनीतिक सपेरा

खबर को सिर्फ पढ़िए नहीं, सवाल भी पूछिए।

किसी भी राजनीतिक खबर को समझने के लिए घटना के साथ उसका असर, संदर्भ और आगे होने वाले बदलावों पर भी नज़र रखना जरूरी है।

रिपोर्टिंग नोट

इस खबर को उपलब्ध रिपोर्टों और स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है।

राजनीतिक सपेरा

सत्ता के खेल पर नज़र

इस रिपोर्ट में कोई तथ्यात्मक गलती मिली? सुधार के लिए हमें बताएं।

सुधार के लिए हमें बताएं →
इसे शेयर करें