LIVEसत्ता से सवाल, जनता की आवाज़
राजनीतिक सपेरा
राजनीतिक सपेरा
सत्ता के खेल पर नज़र
सिस्टम की पोल• ARTICLE #752• 28 अक्टूबर 2026 को 12:24 am बजे

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एसीपी द्वारा दर्ज एससी/एसटी एक्ट मामले में जांच पर रोक लगाने से इनकार किया

दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महिला पत्रकार और उसके सहयोगी के खिलाफ एसीपी की शिकायत पर दर्ज मामले में जांच पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। अदालत ने मामले में पुलिस और शिकायतकर्ता से जवाब तलब किया है।

राजनीतिक सपेरा•4 मिनट पढ़ने का समय
शेयर करें
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एसीपी द्वारा दर्ज एससी/एसटी एक्ट मामले में जांच पर रोक लगाने से इनकार किया
राजनीतिक सपेरा

दिल्ली उच्च न्यायालय ने उस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए महिला पत्रकार और उसके पुरुष सहयोगी के खिलाफ चल रही जांच पर अंतरिम रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया है, जो एक सहायक पुलिस आयुक्त (एसीपी) की शिकायत पर दर्ज किया गया था। अदालत ने इस मामले में दिल्ली पुलिस और शिकायतकर्ता एसीपी को नोटिस जारी कर उनका पक्ष मांगा है।

यह पूरा कानूनी विवाद अक्टूबर की शुरुआत में राष्ट्रीय राजधानी के जंतर-मंतर या उसके आसपास हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान सामने आए तनाव और आमने-सामने की स्थिति से जुड़ा हुआ है। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और मीडियाकर्मियों के बीच टकराव की स्थिति बनी थी, जिसके बाद दोनों पक्षों की ओर से गंभीर आरोप लगाए गए।

एसीपी विवेक भगत ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया है कि विरोध प्रदर्शन को संभालने और कार्रवाई के दौरान महिला पत्रकार ने उनके खिलाफ कथित तौर पर जातिसूचक टिप्पणियां कीं और उनका सार्वजनिक रूप से अपमान करने के साथ आधिकारिक ड्यूटी में बाधा डाली। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है।

दूसरी ओर, महिला पत्रकार और उसके कानूनी प्रतिनिधियों का पक्ष इसके बिल्कुल विपरीत है। महिला पक्ष के वकील ने उच्च न्यायालय में यह तर्क दिया कि एसीपी द्वारा दर्ज कराई गई यह एफआईआर पूरी तरह से झूठी और निराधार है। उनका दावा है कि यह कार्रवाई केवल महिला को डराने और उसके द्वारा पहले दर्ज कराई गई यौन उत्पीड़न की शिकायत को वापस लेने या दबाने के लिए दबाव बनाने के वास्ते की गई है।

इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि महिला पत्रकार ने विरोध प्रदर्शन के दौरान हिरासत में लिए जाने के समय अपने साथ यौन उत्पीड़न होने का गंभीर आरोप लगाया था। इस यौन उत्पीड़न की अलग से दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच द्वारा जांच की जा रही है, जो इस पूरे विवाद को दोनों पक्षों के बीच चल रहे प्रति-आरोपों के घेरे में खड़ा करती है।

न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्ण की पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि इस शुरुआती स्तर पर बिना दोनों पक्षों का विस्तृत पक्ष सुने जांच पर कोई रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि मामले में सभी पहलुओं पर विचार करने की आवश्यकता है और इसके लिए नोटिस जारी किया जा रहा है।

अदालत ने दिल्ली पुलिस और संबंधित पुलिस अधिकारी को निर्देश दिया है कि वे निर्धारित तारीख तक अपना औपचारिक जवाब अदालत के सामने रखें। इसके साथ ही इस पूरे प्रकरण की अगली सुनवाई के लिए नवंबर के मध्य की तिथि तय की गई है, जिसमें मामले के विभिन्न कानूनी पहलुओं पर आगे की सुनवाई होगी।

यह मामला एक बार फिर पुलिस और मीडियाकर्मियों के बीच मैदानी स्तर पर होने वाले टकराव, प्रशासनिक अधिकारियों की सुरक्षा से जुड़े कानूनों और दूसरी तरफ नागरिकों द्वारा लगाए जाने वाले गंभीर प्रति-आरोपों के बीच संतुलन के कानूनी पहलुओं को सामने लाता है।

वर्तमान स्थिति में अदालत ने जांच रोकने से मना कर दिया है, जिससे पुलिस के पास अपनी जांच आगे बढ़ाने का रास्ता खुला है। हालांकि, महिला पत्रकार द्वारा लगाए गए यौन उत्पीड़न के आरोपों की जांच क्राइम ब्रांच के स्तर पर जारी है, जिससे मामले के दोनों मोर्चों पर कानूनी प्रक्रिया समानांतर रूप से चल रही है।

अब इस मामले में अगली सुनवाई और जांच एजेंसियों द्वारा अदालत में दाखिल किए जाने वाले जवाबों पर सबकी नजर टिकी है। न्यायालय के रुख से साफ है कि अंतिम आदेश पक्षों की दलीलें और पुलिस रिपोर्ट देखने के बाद ही तय होंगे।

राजनीतिक सपेरा

खबर को सिर्फ पढ़िए नहीं, सवाल भी पूछिए।

किसी भी राजनीतिक खबर को समझने के लिए घटना के साथ उसका असर, संदर्भ और आगे होने वाले बदलावों पर भी नज़र रखना जरूरी है।

रिपोर्टिंग नोट

इस खबर को उपलब्ध रिपोर्टों और स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है।

राजनीतिक सपेरा

सत्ता के खेल पर नज़र

इस रिपोर्ट में कोई तथ्यात्मक गलती मिली? सुधार के लिए हमें बताएं।

सुधार के लिए हमें बताएं →
इसे शेयर करें