भारत इस पूरे संघर्ष में बेहद मुश्किल कूटनीतिक संतुलन साध रहा है। एक तरफ ईरान के साथ भारत के पुराने राजनीतिक और आर्थिक रिश्ते हैं, दूसरी तरफ इजरायल और अरब देशों के साथ भी भारत के महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक संबंध हैं।

यही वजह है कि नई दिल्ली का संदेश लगातार एक जैसा रहा है—युद्ध का समाधान बातचीत और कूटनीति से होना चाहिए।

मोदी ने पेज़ेशकियान के साथ बातचीत में भी यही रुख दोहराया और क्षेत्र में स्थायी शांति और स्थिरता की जरूरत पर जोर दिया।

लेकिन कहानी का दूसरा हिस्सा और ज्यादा महत्वपूर्ण है।

ईरान और अमेरिका के बीच चल रही लड़ाई ने समुद्री व्यापार की सुरक्षा को सीधे प्रभावित किया है। खाड़ी क्षेत्र और उसके आसपास की अस्थिरता का असर तेल, गैस और दूसरे सामान की सप्लाई पर पड़ सकता है। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर समुद्री रास्तों पर निर्भर है, यह किसी छोटे खतरे की बात नहीं है।

BRICS के मंच पर भी समुद्री व्यापार का मुद्दा सामने आया। मोदी ने BRICS Business Forum में कहा कि वैश्विक व्यापार तभी आगे बढ़ सकता है जब समुद्री रास्ते सुरक्षित हों, सप्लाई रूट खुले रहें और नाविक सुरक्षित रहें।

ईरानी राष्ट्रपति पेज़ेशकियान ने भी BRICS से ऐसा माहौल बनाने की अपील की जिसमें कोई देश दूसरे देशों के वैध व्यापार को बाधित न कर सके।

और यहीं से RAJNITIK SAPERA की नजर में असली खेल शुरू होता है।

भारत सिर्फ ईरान से बात नहीं कर रहा। भारत एक साथ ईरान, अमेरिका, रूस, इजरायल और खाड़ी के अरब देशों के साथ अपने रिश्तों को संभालने की कोशिश कर रहा है।

BRICS सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और ईरान के राष्ट्रपति पेज़ेशकियान की मौजूदगी इस कूटनीतिक गणित को और दिलचस्प बना देती है।

भारत का मकसद साफ दिखाई देता है—किसी एक खेमे में पूरी तरह खड़े हुए बिना अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करना।

लेकिन यह संतुलन आसान नहीं है।

अगर खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष और बढ़ता है तो इसका सीधा असर तेल की कीमतों, समुद्री बीमा, जहाजों के रास्तों और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है। यही कारण है कि दिल्ली के लिए यह सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा का भी सवाल है।

जंग का मैदान अब सिर्फ जमीन पर नहीं है।

इसकी एक बड़ी लड़ाई समंदर में है—जहां तेल के टैंकर, मालवाहक जहाज और अंतरराष्ट्रीय व्यापार की पूरी सप्लाई चेन दांव पर लगी है।

और भारत की चुनौती यही है कि बमों के बीच भी व्यापार चलता रहे और कूटनीति का दरवाजा बंद न हो।

Source: Reuters Published: 12 सितंबर 2026