अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) ने साफ कर दिया है कि ईरान के साथ चल रहे सैन्य संघर्ष और उसके चलते आसमान छूती ऊर्जा कीमतों के बीच विकासशील और कम आय वाले देशों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। बैंकॉक में आयोजित वार्षिकोत्सव बैठकों के दौरान IMF अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि भारी कर्ज से दबे और तेल आयात पर निर्भर रहने वाले इन देशों के पास सरकारी खर्च में कटौती करने या ऋण पुनर्गठन का रास्ता अपनाने के अलावा फिलहाल कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है。
पश्चिम एशिया में छिड़े इस युद्ध ने वैश्विक स्तर पर ऊर्जा की आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है, जिससे ईंधन और अन्य जरूरी चीजों के दाम तेजी से बढ़े हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था पहले ही महामारी और पिछले कई संघर्षों के झटकों से पूरी तरह उभर नहीं पाई थी। ऐसे में ऊर्जा संकट का यह नया झटका उन देशों पर सबसे भारी पड़ रहा है, जिनके पास अपनी अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए पर्याप्त राजकोषीय संसाधन या वित्तीय बफर मौजूद नहीं हैं。
IMF के अनुसंधान विभाग की उप निदेशक पेट्या कोएवा-ब्रूक्स ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि जहां सार्वजनिक ऋण टिकाऊ नहीं है, वहां समय रहते उस ऋण को व्यवस्थित करना और पुनर्गठन का रास्ता चुनना हमेशा भविष्य की अनिश्चितता में प्रतीक्षा करने से बेहतर होता है। उन्होंने माना कि यह प्रक्रिया बेहद दर्दनाक हो सकती है, लेकिन कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के लिए इसके बिना स्थिरता पाना मुश्किल होगा。
वैश्विक आर्थिक मोर्चे पर तस्वीर मिली-जुली और कई जोखिमों से घिरी हुई है। वैश्विक विकास दर के मोर्चे पर IMF ने वर्ष 2026 के लिए 3.1 प्रतिशत और 2027 के लिए 3.4 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया है। हालांकि, इस मामूली वृद्धि के पीछे एक बड़ा कारण उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई (AI) से जुड़ा भारी निवेश और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियां हैं。
संस्था की प्रबंध निदेशक क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने पहले ही यह चिंता जताई है कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था काफी हद तक केवल एक ही पैर यानी एआई आधारित निवेश के सहारे खड़ी है। यदि भविष्य में तकनीकी बाजारों में सुधार या गिरावट आती है और अपेक्षित उत्पादकता लाभ नहीं मिलता है, तो पूरी वैश्विक जीडीपी पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
विकासशील देशों के लिए यह स्थिति दोहरी मार जैसी है। एक तरफ उन्हें वैश्विक बाजार में महंगी ऊर्जा खरीदनी पड़ रही है, तो दूसरी तरफ उन्हें अपने यहां जरूरी सामाजिक खर्च और सब्सिडी को भी सीमित करना पड़ रहा है ताकि बढ़ते कर्ज के बोझ से निपटा जा सके। IMF ने ऐसे देशों को सलाह दी है कि वे अपने सीमित संसाधनों का इस्तेमाल केवल सबसे जरूरी और लक्षित राहत कार्यों के लिए ही करें।
इस भू-राजनीतिक संघर्ष और वैश्विक आर्थिक बदलाव के बीच सबसे बड़ा सवाल यह बना हुआ है कि क्या अत्यधिक कर्ज में डूबे विकासशील देश समय रहते अपनी वित्तीय नीतियों को सुधार पाएंगे या नहीं। मध्य पूर्व के इस संघर्ष और प्रमुख समुद्री मार्गों पर मंडराता संकट यदि लंबा खिंचा, तो गरीब देशों के लिए अपने नागरिकों को राहत देना और भी कठिन हो जाएगा।
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