भारत के 21 प्रमुख समाचार प्रकाशकों और डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) ने केंद्र सरकार के 'डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2023' और इसके नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस कानून में पत्रकारिता और संपादकीय गतिविधियों के लिए कोई विशिष्ट छूट नहीं दी गई है, जिससे खोजी पत्रकारिता और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा पर गंभीर असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन-न्यायाधीशों की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है, और इस मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर के लिए तय की गई है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दायर दस्तावेजों और कानूनी दलीलों में कहा गया है कि नए डेटा गोपनीयता कानून के कड़े प्रावधान पूर्व-सेंसरशिप की तरह काम कर सकते हैं। इसके तहत किसी व्यक्ति या मामले की जांच करने से पहले उसकी सहमति लेने की अनिवार्यता जैसी शर्तें जोड़ी गई हैं, जिससे भ्रष्टाचार या अन्य मामलों से जुड़े सबूत नष्ट होने या गवाहों को प्रभावित किए जाने का खतरा पैदा हो सकता है।
इस कानूनी चुनौती में देश के कई बड़े मीडिया संस्थान शामिल हैं, जिनमें अंबानी और अडानी समूहों के स्वामित्व वाले नेटवर्क18 और एनडीटीवी जैसे संस्थान भी शामिल हैं, साथ ही अन्य प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म और समाचार पत्र भी इस याचिका का हिस्सा हैं। मीडिया संघों और प्रकाशकों का कहना है कि इस तरह के नियमों से पत्रकारों के गोपनीय संवाद और व्हिसलब्लोअर की सुरक्षा कमजोर होगी।
कानून के जानकारों और याचिकाकर्ताओं के अनुसार, यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे देशों के डेटा सुरक्षा कानूनों में पत्रकारों और मीडिया गतिविधियों के लिए विशेष छूट दी गई है, लेकिन भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं रखा गया है। इसके अलावा, डीपीजीपी एक्ट की धारा 44(3) के जरिए आरटीआई अधिनियम (Right to Information Act, 2005) की धारा 8(1)(j) में भी संशोधन किया गया है, जिसने सार्वजनिक कार्यालयों से जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी के दायरे को प्रभावित किया है।
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भी इस पर चिंता जताई है कि सार्वजनिक हित की छूट के बिना सभी व्यक्तिगत डेटा को संसाधित करने के नियमों से खोजी रिपोर्टिंग में बाधा आएगी। दूसरी ओर, सरकार का पक्ष यह रहा है कि यह कानून डिजिटल उपयोगकर्ताओं के व्यक्तिगत डेटा की गोपनीयता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से बनाया गया है, जिसके तहत डेटा प्रोसेसिंग के लिए सहमति या वैध उपयोग अनिवार्य किए गए हैं।
इस मामले में अभी केंद्र सरकार का विस्तृत आधिकारिक जवाब अदालत के सामने आना बाकी है। जैसे-जैसे सुनवाई आगे बढ़ेगी, यह देखना अहम होगा कि क्या सरकार अदालत में पत्रकारिता और आरटीआई के दायरे को लेकर कोई बदलाव या स्पष्टीकरण पेश करती है या नहीं।
यह मामला भारतीय मीडिया जगत, खोजी पत्रकारिता, आरटीआई पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना के अधिकार के भविष्य को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाला है। 17 नवंबर को होने वाली अगली सुनवाई में यह स्पष्ट होगा कि सुप्रीम कोर्ट इस कानूनी विवाद पर क्या रुख अपनाता है।
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