अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने फ्लोरिडा में एक चुनावी रैली के दौरान संकेत दिया है कि अमेरिका ईरान के खिलाफ एक और सैन्य कार्रवाई कर सकता है। ट्रम्प ने अपने संबोधन में कहा कि अमेरिका 'एक और छोटी एपिक फ्यूरी' जैसी कार्रवाई कर सकता है। यह बयान ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ शुरू किया गया सैन्य संघर्ष अपने आठवें महीने में प्रवेश कर रहा है।
इस नए तनाव और संभावित सुरक्षा खतरों के मद्देनजर अमेरिका ने मध्य पूर्व के कई देशों में अपने दूतावासों से कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका ने लेबनान, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और जॉर्डन में स्थित अपने दूतावासों से कुछ गैर-जरूरी राजनयिक स्टाफ और उनके परिवारों को अस्थायी रूप से वापस बुलाना शुरू कर दिया है। क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चिंता जताई जा रही है।
फरवरी के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष के बाद से ईरान और उसके समर्थकों ने इजरायल और खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर लगातार जवाबी हमले किए हैं। इस युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति, ईंधन और गैस की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव बना हुआ है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर साफ देखा जा रहा है।
इस बीच अमेरिका में आगामी तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले यह भू-राजनीतिक तनाव घरेलू राजनीति का भी एक बड़ा मुद्दा बन गया है। बढ़ती महंगाई और ईंधन की कीमतें मतदाताओं के बीच चर्चा का केंद्र हैं, जिससे राजनीतिक हलकों में सरगर्मी तेज हो गई है।
यूरोपीय देशों ने इस बढ़ते टकराव पर गहरी चिंता व्यक्त की है। ब्रिटेन और फ्रांस के विदेश मंत्रियों ने चेतावनी दी है कि ईरान और अमेरिका के बीच किसी भी नए सैन्य संघर्ष से क्षेत्र में स्थिरता और बिगड़ेगी तथा इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे। इन देशों ने सैन्य विकल्प के बजाय कूटनीति और बातचीत के रास्ते पर जोर दिया है।
ईरान की ओर से भी इस चेतावनी पर कड़ी प्रतिक्रिया सामने आई है। ईरानी अधिकारियों ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी सैन्य जहाजों के प्रवेश पर रोक लगाने की चेतावनी दी है और यह भी कहा है कि यदि दोबारा हमले होते हैं तो वे क्षेत्र में रणनीतिक बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकते हैं।
इस संघर्ष के कारण मध्य पूर्व में कूटनीतिक और सैन्य हलचल तेज हो गई है। क्षेत्रीय और वैश्विक ताकतें तनाव को कम करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों में जुटी हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति अभी भी बेहद तनावपूर्ण बनी हुई है।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या अमेरिका चुनाव से पहले या बाद में किसी बड़े सैन्य कदम की ओर बढ़ता है या कूटनीतिक दबाव के जरिए स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की जाती है। वैश्विक समुदाय इस पूरे घटनाक्रम पर करीबी नजर रखे हुए है।
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