देश में सूचना के अधिकार यानी आरटीआई अधिनियम को लेकर एक बड़ा प्रशासनिक घटनाक्रम सामने आया है। एक संसदीय पैनल ने केंद्रीय सूचना आयोग में लंबित मामलों की संख्या दस हजार से अधिक होने पर गंभीर चिंता जताई है। इस बड़े बैकलॉग के सामने आने के बाद अब आरटीआई अधिनियम की समीक्षा की जा रही है, ताकि यह देखा जा सके कि व्यवस्था में कहां सुधार की गुंजाइश है।
केंद्रीय सूचना आयोग यानी सीआईसी देश भर में नागरिकों के सूचना के अधिकार से जुड़े मामलों को देखने वाली सबसे बड़ी शीर्ष संस्था है। आयोग का मुख्य काम यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी विभागों और महकमों से समय पर सही जानकारी नागरिकों तक पहुंचे। लेकिन पिछले कुछ समय से मामलों के निपटारे की रफ्तार धीमी होने के कारण लंबित मामलों का आंकड़ा लगातार बढ़ता गया है।
संसदीय पैनल की इस पड़ताल के बाद प्रशासनिक स्तर पर हलचल तेज हो गई है। पैनल ने यह रेखांकित किया है कि दस हजार से ज्यादा मामलों का लंबित रहना नागरिकों के समय पर जानकारी पाने के अधिकार को सीधा प्रभावित करता है। इसी को ध्यान में रखते हुए अब कानून के कामकाज और उसकी प्रक्रियाओं की गहन समीक्षा का दौर शुरू हुआ है।
आरटीआई कानून के जानकारों और प्रशासनिक सुधारों पर नजर रखने वालों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में मामलों का पेंडing रहना गंभीर विषय है। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि समीक्षा के बाद इस कानून में किस तरह के नए बदलाव या संशोधन किए जाएंगे। लेकिन इतना तय है कि मामलों के निपटारे में हो रही देरी को कम करने के लिए पैनल और संबंधित महकमे नए उपायों पर विचार कर रहे हैं।
सूचना का अधिकार कानून देश में पारदर्शिता लाने और सरकारी कामकाज को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का एक बड़ा जरिया रहा है। ऐसे में सीआईसी स्तर पर बैकलॉग का बढ़ना इस पूरी व्यवस्था की सेहत पर सवाल खड़े करता है। इस समीक्षा के जरिए यह तय करने की कोशिश होगी कि आयोग की कार्यप्रणाली को कैसे तेज और असरदार बनाया जाए।
आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि संसदीय पैनल की इस रिपोर्ट और आरटीआई अधिनियम की चल रही समीक्षा के बाद सरकार और आयोग क्या ठोस कदम उठाते हैं। क्या बैकलॉग को खत्म करने के लिए नए दिशा-निर्देश आएंगे या कोई ढांचागत बदलाव किया जाएगा, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं।
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