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सिस्टम की पोल• ARTICLE #788• 30 अक्टूबर 2026 को 10:16 pm बजे

डिजिटल ठगी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बैंकों से कहा- लापरवाही हुई तो पीड़ितों को देना होगा मुआवजा

डिजिटल धोखाधड़ी और म्यूल खातों पर नकेल कसने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने साफ किया है कि यदि बैंक उचित सावधानी बरतने में नाकाम रहते हैं, तो उन्हें पीड़ितों को नुकसान की पूरी भरपाई करनी होगी।

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डिजिटल ठगी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, बैंकों से कहा- लापरवाही हुई तो पीड़ितों को देना होगा मुआवजा
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सर्वोच्च अदालत का सख्त रुख

डिजिटल धोखाधड़ी और म्यूल खातों यानी किराए के खातों के जरिए होने वाले साइबर अपराधों पर लगाम लगाने के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने सुनवाई के दौरान साफ कर दिया है कि यदि बैंक उचित सावधानी और मुस्तैदी बरतने में विफल रहते हैं, तो डिजिटल फ्रॉड के पीड़ितों को उनके खोए हुए पैसों का पूरा मुआवजा बैंकों को देना होगा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति Joymalya Bagchi तथा V. Mohana की बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत ने वित्तीय संस्थानों की जवाबदेही तय करते हुए यह निर्देश दिया है कि बैंकों को यह सुनिश्चित करना होगा कि यदि ग्राहक किसी लापरवाही का शिकार होता है, तो उसकी भरपाई बैंक करें।

साइबर अपराध और वित्तीय नुकसान

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने देश में बढ़ते साइबर अपराधों और वित्तीय नुकसान के आंकड़े भी रखे गए। मुख्य न्यायाधीश ने उल्लेख किया कि इस वर्ष देश में डिजिटल धोखाधड़ी के कारण लोगों को लगभग 800 करोड़ रुपये का भारी नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि, सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि ने अदालत को जानकारी दी कि सरकारी मंत्रालयों, अदालती दखल और लगातार चलाए जा रहे जागरूकता अभियानों के कारण 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों में पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत की कमी आई है। इसके बावजूद साइबर अपराधियों के नए तौर-तरीके और म्यूल खातों का इस्तेमाल सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

आरबीआई की भूमिका और नए नियम

इस पूरे मामले में रिजर्व बैंक यानी RBI के नियमों और भूमिका को भी परखा जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय रिजर्व बैंक के प्रस्तावित 'Know Your Customer (KYC) Amendment Directions, 2026' के मसौदे पर गौर करने का फैसला किया है। अदालत ने कहा है कि इन नए नियमों को आधिकारिक रूप से लागू करने से पहले उनकी पूरी जांच की जाएगी ताकि वित्तीय सुरक्षा के घेरे को और मजबूत किया जा सके। अदालत ने निर्देश दिया है कि बैंक असामान्य और संदेहास्पद लेन-देन को तुरंत अस्थायी रूप से रोकें, स्वचालित रिपोर्टिंग प्रणाली तैयार करें और लेनदेन की प्रामाणिकता के लिए पुख्ता भौतिक सत्यापन सुनिश्चित करें।

इसके अलावा, तकनीकी कंपनियों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जिम्मेदारी भी तय की जा रही है। सुनवाई के दौरान व्हाट्सएप ने अदालत को बताया कि उसने डिजिटल अरेस्ट और धोखाधड़ी से जुड़े लगभग 9,400 संदिग्ध खातों को प्रतिबंधित किया है। अदालत के निर्देशों के मुताबिक, अब बैंकों को यह जिम्मेदारी भी दी गई है कि यदि कोई ग्राहक डिजिटल अरेस्ट घोटाले का शिकार हो रहा है और उसके खाते से असामान्य लेन-देन चल रहा है, तो बैंक तुरंत नजदीकी पुलिस स्टेशनों को सतर्क करें।

यह पूरा मामला 'In Re: Victims of Digital Arrest Related to Forged Documents' शीर्षक के तहत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वतः संज्ञान लेकर मॉनिटर किया जा रहा है। देश भर में वरिष्ठ नागरिकों और अन्य भोले-भाले नागरिकों को जाली अदालती आदेशों और डिजिटल अरेस्ट के नाम पर डराकर बड़े पैमाने पर ठगी की घटनाएं सामने आई थीं, जिसके बाद अदालत ने यह कदम उठाया है।

न्यायपालिका का साफ रुख है कि वित्तीय संस्थान केवल मुनाफे के जिम्मेदार नहीं हैं, बल्कि ग्राहकों के पैसों की सुरक्षा के लिए उनकी सीधी जवाबदेही बनती है। दूसरी ओर, सरकार और आरबीआई की तरफ से सुरक्षा उपायों को तकनीकी रूप से लागू करने और नियमों के तालमेल की बात कही जा रही है।

निष्कर्ष

इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा असर यह होगा कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों को अपनी सुरक्षा प्रणालियों, संदिग्ध खातों की निगरानी और केवाईसी नियमों को बेहद सख्त करना होगा। यदि अदालत के इन निर्देशों को पूरी सख्ती से लागू किया जाता है, तो बैंकों की जवाबदेही तय होने से आम नागरिकों की गाढ़ी कमाई को सुरक्षित रखने में एक मजबूत सुरक्षा कवच मिलेगा।

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