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राजनीतिक शतरंज• ARTICLE #328• 1 अक्टूबर 2026 को 9:06 am बजे

100 करोड़ वोटरों की लिस्ट पर सवाल: चुनाव आयोग के अंदर 14 आपत्तियाँ, बाहर सियासी तूफान

भारत में 100 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं की सूची की जाँच ने चुनाव आयोग को बड़े विवाद के बीच ला खड़ा किया है। दो Election Commissioners की कम-से-कम 14 आपत्तियों की खबर, करीब 13 करोड़ नामों का शुरुआती सूचियों से बाहर रहना और अब Supreme Court तक पहुँचा मामला—समझिए SIR में आखिर हुआ क्या और विवाद इतना बड़ा क्यों है।

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100 करोड़ वोटरों की लिस्ट पर सवाल: चुनाव आयोग के अंदर 14 आपत्तियाँ, बाहर सियासी तूफान
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100 करोड़ वोटरों की लिस्ट पर सवाल: चुनाव आयोग के अंदर 14 आपत्तियाँ, बाहर सियासी तूफान

सोचिए, चुनाव का दिन है।

आप मतदान केंद्र पहुँचे। Voter ID आपके हाथ में है। लेकिन वहाँ जाकर पता चलता है— मतदाता सूची में आपका नाम ही नहीं है। अब सवाल यह नहीं कि आप किसे वोट देना चाहते थे। सवाल यह है कि— आप वोट दे भी पाएँगे या नहीं?

भारत में इस समय चुनावी बहस EVM से आगे बढ़कर उस सूची तक पहुँच गई है जो तय करती है कि मतदान केंद्र पर वोट डालने कौन जाएगा। यानी—

Electoral Roll

या आसान भाषा में— मतदाता सूची। Election Commission of India देशभर में मतदाता सूचियों का Special Intensive Revision यानी SIR कर रहा है। मकसद है voter rolls को जाँचना और मृत, स्थानांतरित, duplicate या अपात्र entries को हटाते हुए पात्र मतदाताओं को सही सूची में रखना। लेकिन इसी प्रक्रिया पर अब इतने सवाल उठ गए हैं कि मामला सड़क से Supreme Court तक पहुँच गया है। Reuters और कहानी का सबसे असामान्य हिस्सा यह है— सवाल सिर्फ विपक्ष नहीं उठा रहा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक Election Commission के अंदर भी फैसलों को लेकर मतभेद दर्ज किए गए थे।

1. पहले समझिए—SIR आखिर है क्या?

भारत में चुनाव कराने से पहले Election Commission को यह तय करना होता है कि किसी constituency में eligible voters कौन हैं। इसके लिए electoral roll बनाई जाती है। समय के साथ इसमें कई तरह के बदलाव होते रहते हैं। किसी मतदाता की मृत्यु हो जाती है। कोई दूसरी जगह रहने चला जाता है। कोई 18 साल का होकर पहली बार voter बनता है। कहीं duplicate entry हो सकती है। इसलिए voter list को समय-समय पर update करना जरूरी होता है। Special Intensive Revision इसी प्रक्रिया का ज्यादा व्यापक रूप है।

Election Commission के आधिकारिक schedule से पता चलता है कि 2026 में अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR को चरणों में लागू किया गया। Election Commission of India लेकिन इस बार scale बहुत बड़ा है। Reuters के मुताबिक verification exercise एक अरब से ज्यादा मतदाताओं को छू रही है। Reuters

SIR का पैमाना

1 अरब+ मतदाता

13 करोड़ नाम

पहले मौजूद सूचियों के मुकाबले शामिल नहीं थे।

लेकिन यहाँ एक जरूरी बात समझिए। 13 करोड़ का मतलब यह नहीं कि 13 करोड़ भारतीयों का voting right हमेशा के लिए खत्म कर दिया गया। Draft roll से बाहर रहना और final deletion एक ही चीज नहीं है। Claims, objections, verification और नाम दोबारा जोड़ने की प्रक्रियाएँ भी होती हैं। Reuters यही फर्क इस पूरी बहस में बहुत जरूरी है।

2. विवाद शुरू कहाँ से हुआ?

अगर कहानी सिर्फ इतनी होती कि Election Commission voter list साफ कर रहा है, तो शायद मामला इतना बड़ा नहीं बनता। विवाद तब तेज हुआ जब Indian Express की investigation में Election Commission के अंदर मतभेद होने की बात सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar के साथ काम कर रहे दो Election Commissioners— Sukhbir Singh Sandhu और Vivek Joshi ने लगभग 10 महीनों के दौरान voter rolls और SIR से जुड़े फैसलों पर कम-से-कम—

14 बार

आपत्तियाँ दर्ज की थीं। Reuters ने भी इन reported objections को अपनी coverage में दर्ज किया है। Reuters यहीं कहानी बदल गई। क्योंकि अब सवाल सिर्फ voter list का नहीं था। सवाल Election Commission के अंदर फैसले लेने की प्रक्रिया का भी था।

Election Commission में कौन-कौन है?

Election Commission की मौजूदा तीन-सदस्यीय संरचना में हैं: Gyanesh Kumar — Chief Election Commissioner Sukhbir Singh Sandhu — Election Commissioner Vivek Joshi — Election Commissioner

Election Commission की official website भी इन्हीं तीनों को मौजूदा Commission के रूप में सूचीबद्ध करती है। Election Commission of India Gyanesh Kumar ने 19 फरवरी 2025 को भारत के 26वें Chief Election Commissioner के रूप में पद संभाला था। Election Commission of India

3. 14 आपत्तियाँ इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं?

इसे एक आसान उदाहरण से समझिए। मान लीजिए किसी संस्था में तीन लोगों की committee है। एक Chairman और दो members। अगर तीनों एक फैसले पर सहमत हैं, तो कोई सवाल नहीं। लेकिन अगर बाकी दोनों members बार-बार लिखकर कह रहे हों— “इस तरीके से फैसला नहीं होना चाहिए।” तो फिर सवाल उठता है कि final decision कैसे लिया गया? मौजूदा विवाद में भी यही मुद्दा है।

Supreme Court में दाखिल petition में आरोप लगाया गया है कि CEC ने SIR से जुड़े कुछ फैसले बाकी Commissioners की जरूरी सहमति के बिना लिए। लेकिन यह फिलहाल याचिकाकर्ता का आरोप है, अदालत का निष्कर्ष नहीं।

Supreme Court ने इस मामले को सुनने पर सहमति जताई है और सुनवाई अगले सप्ताह होने की उम्मीद है। The Indian Express

4. Election Commission क्या कहता है?

यहाँ दूसरी तरफ की बात उतनी ही जरूरी है। Election Commission ने अपने ऊपर लगे राजनीतिक पक्षपात के आरोपों को स्वीकार नहीं किया है। Commission का कहना है कि उसके फैसले कानून के मुताबिक लिए गए हैं और एक multi-member institution में internal disagreements होना असामान्य बात नहीं है। विवाद बढ़ने के बाद Commission ने voter-roll software की review भी शुरू की।

Reuters के मुताबिक एक senior election official और independent technology expert यह जाँचेंगे कि software और प्रक्रिया कानूनी requirements के अनुरूप हैं या नहीं। Reuters इसके साथ Commission ने decision-making में transparency बढ़ाने के लिए meetings के agendas पहले circulate करने और बाद में formal minutes जारी करने की व्यवस्था की है। The Economic Times यानी Commission का जवाब मोटे तौर पर यह है— सिस्टम की जाँच हो सकती है, लेकिन इससे manipulation साबित नहीं हो जाता।

5. फिर 13 करोड़ नाम कहाँ गए?

यही इस कहानी का सबसे संवेदनशील सवाल है।

Reuters के मुताबिक SIR शुरू होने के बाद विभिन्न initial draft rolls में लगभग 130 million यानी 13 करोड़ नाम पहले की सूचियों के मुकाबले शामिल नहीं थे। Reuters लेकिन इस आंकड़े को बहुत सावधानी से समझना जरूरी है। इनमें हर व्यक्ति को स्थायी रूप से मतदाता सूची से निकाल दिया गया—ऐसा कहना गलत होगा।

कई entries मृत्यु, migration, duplication या verification पूरा न होने जैसी वजहों से draft stage में बाहर हो सकती हैं। और पात्र व्यक्ति claims और objections के जरिए अपना नाम वापस जुड़वा सकता है। इसीलिए असली सवाल सिर्फ यह नहीं है कि— कितने नाम draft list से बाहर हुए? बल्कि यह भी है— कितने genuine voters final list से गलत तरीके से बाहर रह गए? इसका पूरा final national picture अभी स्पष्ट नहीं है।

6. Form 6 का नया विवाद क्या है?

आज यानी 1 अक्टूबर को कहानी में एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आया है। Indian Express के मुताबिक Election Commission ने उन राज्यों के लिए online Form 6 से SIR से जुड़ी अतिरिक्त declaration हटाई है जहाँ revision process पूरा हो चुका है। The Indian Express Form 6 नए voter के registration के लिए इस्तेमाल होता है।

विवाद यह था कि digital form में एक अतिरिक्त declaration जोड़ी गई थी जिसमें applicant या उसके परिवार की पिछली electoral roll में मौजूदगी से जुड़ी जानकारी मांगी जा रही थी। रिपोर्ट के मुताबिक दो Election Commissioners ने इस बदलाव के कानूनी तरीके पर आपत्ति जताई थी। Indian Express - Bangla अब completed-SIR states के online form से वह हिस्सा हटाया जाना इस विवाद को और महत्वपूर्ण बना देता है। लेकिन इसे यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि इससे सारे पुराने फैसले अपने-आप अवैध साबित हो गए। यह सवाल अब कानूनी बहस का हिस्सा है।

7. विपक्ष क्या आरोप लगा रहा है?

Congress और दूसरे विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि voter-roll exercise में बदलाव BJP को राजनीतिक फायदा पहुँचाने के लिए किए गए। उन्होंने CEC Gyanesh Kumar के इस्तीफे की मांग की है। 25 सितंबर को कई जगह Congress के demonstrations हुए और कुछ स्थानों पर police ने water cannon और tear gas का इस्तेमाल किया। Reuters INDIA bloc ने अब इस मुद्दे को बड़े राजनीतिक अभियान में बदलने का फैसला किया है।

30 सितंबर की बैठक के बाद विपक्षी दलों ने Election Commission की ओर march और नवंबर में दिल्ली में बड़ी rally की योजना घोषित की। The Financial Express लेकिन यहाँ तथ्य और आरोप अलग रखना जरूरी है। वोटर लिस्ट को BJP के फायदे के लिए जानबूझकर manipulate किया गया—यह विपक्ष का आरोप है। यह किसी अदालत या स्वतंत्र जाँच द्वारा अभी स्थापित तथ्य नहीं है।

BJP ने आरोपों को खारिज किया है और विवाद को विपक्ष की चुनावी हार से जोड़कर देखा है। Election Commission भी राजनीतिक manipulation से इनकार करता है। Reuters

8. अब Supreme Court क्या देखेगा?

Supreme Court में पहुँची petition का महत्व इसलिए ज्यादा है क्योंकि मामला सिर्फ यह तय करने का नहीं है कि कोई particular voter list सही थी या गलत। Petition में इससे बड़ा constitutional सवाल उठाया गया है— क्या तीन-सदस्यीय Election Commission में CEC अकेले ऐसे फैसले ले सकता है जिनसे दूसरे Commissioners सहमत न हों?

याचिका Article 324 और Election Commission से जुड़े 2023 के कानून के आधार पर Commission की collective decision-making पर सवाल उठाती है। Supreme Court ने petition सुनने पर सहमति जताई है। The Indian Express अदालत ने अभी आरोपों की सत्यता पर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। इसलिए आने वाली सुनवाई में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि Court— decision-making process, Commissioners की भूमिका, SIR की legality, और disputed voter-roll changes को किस तरह देखता है।

सपेरा की नज़र

चुनाव को अक्सर हम मतदान वाले दिन से देखते हैं। कौन जीता? कौन हारा? किसे कितने वोट मिले? लेकिन थोड़ा ऊपर उठकर पूरा खेल देखिए। वोट गिनने से पहले यह तय होता है कि वोट डालने वालों की सूची में कौन है। और यही वजह है कि electoral roll किसी चुनाव का boring सरकारी document नहीं है। वह चुनाव का दरवाजा है। नाम अंदर है— तो आप वोट दे सकते हैं। नाम गलत तरीके से बाहर रह गया— तो आपकी राजनीतिक पसंद चाहे जो हो, ballot तक पहुँचने से पहले ही समस्या खड़ी हो जाती है। लेकिन दूसरी तरफ voter list को कभी साफ न करना भी समाधान नहीं है।

मृत लोगों, duplicate entries और permanently shifted voters को हटाना भी निष्पक्ष चुनाव के लिए जरूरी है। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि— “Voter list revise होनी चाहिए या नहीं?” वह तो होनी ही चाहिए। असली सवाल है— नाम जोड़ने और हटाने का तरीका कितना पारदर्शी है? गलती होने पर उसे ठीक करना कितना आसान है? और इतने बड़े फैसले लेने वाली संस्था के अंदर checks and balances कितने मजबूत हैं? क्योंकि चुनाव के दिन आपकी उंगली पर स्याही बाद में लगती है। उससे पहले एक बहुत छोटी-सी चीज तय करती है कि आप उस स्याही तक पहुँचेंगे भी या नहीं— मतदाता सूची में लिखा आपका नाम।

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रिपोर्टिंग नोट

इस खबर को उपलब्ध रिपोर्टों और स्रोतों के आधार पर तैयार किया गया है।