आज के दौर में जब किसी भी घरेलू सामान या उपकरण में थोड़ी सी खराबी आती है, तो उसे सुधारने के बजाय तुरंत नया खरीद लेने का चलन आम हो गया है। इस सोच को थ्रोअवे इकोनॉमी यानी फेंकने की संस्कृति कहा जाता है। इस बदलती उपभोक्ता आदत ने पर्यावरण के सामने कचरे का एक बड़ा पहाड़ खड़ा कर दिया है। इसके खिलाफ देश के कुछ हिस्सों में सामुदायिक स्तर पर एक अलग तरह की पहल शुरू हुई है, जिसे रिपेयर कैफे कहा जाता है।
भारत में रिपेयर कैफे और स्थानीय मरम्मत अर्थव्यवस्था का नाता पुराना है, क्योंकि यहां स्थानीय इलेक्ट्रीशियन, दर्जी, मोची और साइकिल मैकेनिक हमेशा से समाज का हिस्सा रहे हैं। लेकिन आधुनिक उपभोक्ता संस्कृति ने इस हुनर और मरम्मत की परंपरा को पीछे छोड़ दिया है। इस खाई को पाटने के लिए समुदायों ने मिलकर ऐसी कार्यशालाएं शुरू की हैं जहां लोग पेशेवर कारीगरों और स्वयंसेवकों की मदद से अपनी टूटी-फूटी चीजें खुद ठीक करना सीखते हैं।
इस आंदोलन की शुरुआत साल 2015 में बेंगलुरु से हुई थी, जब 'रिपेयर कैफे बेंगलुरु' की नींव रखी गई थी। पूर्णा सरकार और हिमाद्री दास जैसे संस्थापकों के प्रयासों से शुरू हुई यह पहल धीरे-धीरे एक बड़े कलेक्टिव में बदल गई। इसके बाद देश के अन्य शहरों में भी ऐसी कार्यशालाओं का सिलसिला शुरू हुआ। पुणे में बाबाजान सज्जन द्वारा स्थापित 'Erepair' जैसी पहलें भी इस दिशा में सक्रिय रूप से काम कर रही हैं।
इन कार्यशालाओं का मुख्य उद्देश्य केवल सामान को ठीक करना नहीं है, बल्कि लोगों को यह सिखाना है कि चीजें कैसे काम करती हैं और उनकी देखभाल कैसे की जाए। इस कलेक्टिव का मानना है कि मरम्मत केवल कार्यक्षमता बहाल करने का जरिया नहीं है, बल्कि यह कचरा घटाने और कौशल को महत्व देने का एक तरीका है। बच्चे भी इस संस्कृति से जुड़ सकें, इसके लिए 'TinkerKinder' नाम से एक विशेष शैक्षिक कार्यक्रम भी चलाया जाता है, जो उन्हें व्यावहारिक समस्या-समाधान से परिचित कराता है।
इन सामुदायिक प्रयासों के ठोस नतीजे भी सामने आने लगे हैं। पूर्व की रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 2019 तक लगभग 40 पॉप-अप आयोजनों की मदद से 4,500 किलोग्राम से अधिक सामग्री को लैंडफिल में जाने से बचाया जा चुका था। वहीं, साल 2023 तक अकेले बेंगलुरु के रिपेयर कैफे द्वारा 50 से अधिक मरम्मत कार्यशालाएं आयोजित की जा चुकी थीं। ये आंकड़े बताते हैं कि छोटी शुरुआत किस तरह बड़े बदलाव की नींव रख सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की पहलें पर्यावरण पर बढ़ते कचरे के दबाव को कम करने में मददगार साबित हो रही हैं। साथ ही, यह स्थानीय कारीगरों और मरम्मत व्यवसायों को भी नया जीवन देती हैं। हालांकि, बड़ा सवाल यह है कि क्या इस तरह के सामुदायिक प्रयास महानगरों से निकलकर देश के छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों तक अपनी पहुंच बना पाएंगे, जहां थ्रोअवे संस्कृति तेजी से पैर पसार रही है।
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