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सपेरा की नज़र• ARTICLE #744• 28 अक्टूबर 2026 को 12:29 am बजे

तेल की बढ़ती कीमतें और समुद्री रास्तों के झटके, भारत की अर्थव्यवस्था पर कितना भारी पड़ रहा संकट?

पश्चिम एशिया के तनाव और समुद्री रास्तों पर बढ़ते जोखिमों के कारण भारत का कच्चा तेल आयात बिल और शिपिंग लागत रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है।

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पश्चिम एशिया में लगातार बनी अस्थिरता और समुद्री परिवहन की मुश्किलों का सीधा असर अब भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखने लगा है। कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव और मालभाड़े में भारी उछाल के कारण देश का ऊर्जा आयात बिल तेजी से बढ़ रहा है। हालात यह हैं कि अक्टूबर 2026 के अंत तक भारत का क्रूड बास्केट 120.46 डॉलर प्रति बैरल के 14 साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जिससे देश के सामने महंगाई और चालू खाता घाटे का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

इस संकट का सबसे बड़ा कारण समुद्री रास्तों पर बढ़ता जोखिम और शिपिंग बीमा में आ रही दिक्कतें हैं। बाजार विश्लेषकों और वित्तीय संस्थानों के आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल की शिपिंग लागत जो कभी 3 डॉलर प्रति बैरल हुआ करती थी, वह अब बढ़कर 20 डॉलर प्रति बैरल से भी अधिक हो गई है। मालभाड़े की ये दरें अपने पुराने स्तर से कई गुना ज्यादा हैं और अब यह कुल लैंडेड क्रूड लागत का एक बड़ा हिस्सा बन चुकी हैं।

बढ़ते मालभाड़े और महंगे प्रीमियम ने तेल कंपनियों की गणित बिगाड़ दी है। इसका सबसे ताजा उदाहरण सरकारी कंपनी बीपीसीएल द्वारा उठाया गया कदम है, जिसने ढुलाई की बढ़ती लागत के चलते नवंबर महीने के लिए रूसी कच्चे तेल की अपनी खरीद में कमी कर दी है। एक समय जो रूसी क्रूड भारत की कुल आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा हुआ करता था, वह अब महंगी शिपिंग के कारण रिफाइनरों के लिए कम फायदेमंद साबित हो रहा है।

ऊर्जा बाजार के इस भूचाल का असर केवल कच्चे तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि एलपीजी जैसे रसोई गैस के मोर्चे पर भी सरकारी कंपनियों पर भारी दबाव है। सरकारी तेल विपणन कंपनियों की एलपीजी पर अंडर-रिकवरी यानी लागत और बिक्री मूल्य का अंतर बढ़कर 62,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। चालू वित्त वर्ष के शुरुआती छह महीनों में ही देश का शुद्ध तेल और गैस आयात बिल 35 प्रतिशत बढ़कर 81.1 अरब डॉलर पर पहुंच चुका है।

रेटिंग एजेंसियों का अनुमान है कि कच्चे तेल की औसत कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत का शुद्ध तेल आयात बिल करीब 12 से 13 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है। ऐसे में वैश्विक स्तर पर बने इस भू-राजनीतिक जोखिम प्रीमियम ने देश के भीतर वृहद आर्थिक स्थिरता और महंगाई प्रबंधन के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। हालांकि मध्य पूर्व से कच्चे तेल का भौतिक निर्यात कुछ हद तक सुधरा है, लेकिन समुद्री रास्तों के अनिश्चित हालात और बीमा की महंगी शर्तें कीमतों को नीचे नहीं आने दे रही हैं।

इस बीच कूटनीतिक स्तर पर भी इस क्षेत्र की निर्भरता को कम करने के प्रयास शुरू हो गए हैं। ओमान के विदेश मंत्री बदर अल-बुसैदी ने फारस की खाड़ी के देशों, इराक और ईरान के लिए एक सुरक्षा और गैर-आक्रामकता संधि का आह्वान किया है। उनका मानना है कि बाहरी ताकतों पर निर्भरता खत्म करने और समुद्री सुरक्षा खुद संभालने के लिए क्षेत्रीय देशों को एक मंच पर आना होगा।

भारत जैसी अर्थव्यवस्था के लिए, जो अपनी कुल तेल जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर होकर पूरा करती है, यह स्थिति बेहद संवेदनशील है। रुपये की विनिमय दर में उतार-चढ़ाव और आयात बिल का यह भारी बोझ आने वाले समय में सरकारी तिजोरी और आम उपभोक्ताओं, दोनों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या तेल कंपनियां और सरकार इस बढ़ते वित्तीय बोझ को खुद उठाएंगी या आने वाले दिनों में इसका सीधा असर आम जनता की जेब पर ईंधन और रसोई गैस की कीमतों के रूप में पड़ेगा। समुद्री रास्तों की यह अनिश्चितता और ऊर्जा बाजारों का यह दबाव तय करेगा कि देश की अर्थव्यवस्था इस झटके से कैसे निपटती है।

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