इसके बाद दोनों देशों ने सीमा पर सैनिकों की तैनाती और आपसी तनाव कम करने के लिए कई दौर की बातचीत की। अक्टूबर 2024 में हुए समझौते के बाद विवादित इलाकों से सैनिकों की वापसी की प्रक्रिया आगे बढ़ी और उसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में धीरे-धीरे नरमी दिखाई देने लगी।
लेकिन यहां कहानी सिर्फ सीमा विवाद की नहीं है।
भारत और चीन के बीच कारोबार भी एक बड़ा सवाल बना हुआ है। चीन 2025-26 में भारत का सबसे बड़ा आयात स्रोत बना और भारत ने चीन से करीब 132 अरब डॉलर का सामान आयात किया। यानी राजनीतिक रिश्तों में तनाव के बावजूद आर्थिक निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।
यही वजह है कि मोदी और जिनपिंग की मुलाकात में सीमा के साथ-साथ व्यापार और बाजार तक पहुंच जैसे मुद्दे भी महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। भारतीय पक्ष लंबे समय से चीन के साथ व्यापार में मौजूद असंतुलन और भारतीय कंपनियों के लिए बाजार पहुंच के सवाल उठाता रहा है।
चीन की तरफ से भी रिश्ते सुधारने का संदेश दिया गया है। चीनी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि दोनों देशों को रणनीतिक और दीर्घकालिक नजरिए से रिश्तों को देखना चाहिए, मतभेदों को सही तरीके से संभालना चाहिए और अच्छे पड़ोसी तथा सहयोगी के रूप में आगे बढ़ना चाहिए।
लेकिन RAJNITIK SAPERA की नजर में असली सवाल यही है—क्या बयानबाजी जमीन पर भी बदलाव लाएगी?
भारत और चीन के रिश्तों में भरोसे की कमी अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। सीमा पर सैन्य तैनाती जारी है और अरुणाचल प्रदेश जैसे इलाकों को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं। निवेश, वीजा और कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी क्षेत्रों में भी अड़चनें कायम हैं।
यानी दिल्ली में लाल कालीन बिछ चुका है, बातचीत का माहौल भी बन रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच रिश्तों की असली परीक्षा अभी बाकी है।
राजनीतिक शतरंज यही है—भारत चीन के साथ रिश्ते सुधारना चाहता है, लेकिन अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों की कीमत पर नहीं।
और चीन भी भारत के साथ टकराव कम करना चाहता है, लेकिन अपने आर्थिक और क्षेत्रीय हित छोड़कर नहीं।
इसलिए मोदी-जिनपिंग मुलाकात को सिर्फ “दोस्ती की वापसी” कहना जल्दबाजी होगी। असली कहानी यह है कि दोनों देश अब टकराव से निकलकर प्रतिस्पर्धा और सहयोग के बीच एक नया संतुलन तलाश रहे हैं।
यही इस मुलाकात की सबसे बड़ी राजनीतिक बाजी है।
Source: Reuters Published: 12 सितंबर 2026

